A dharna in demand of Bundelkhand
सितम्बर 2, 2010 at 1:55 अपराह्न (bundelkhand, bundelkhand movement, bundelkhand video, sanjay pandey, video on bundelkhand)
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लाचार किसानों का मखौल उड़ाया गया है आमिर की “पीपली लाइव” में : संजय पाण्डेय
अगस्त 18, 2010 at 6:18 पूर्वाह्न (बुंदेलखंड, bundelkhand, peepli live, sanjay pandey)
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नई दिल्ली। बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के संयोजक संजय पाण्डेय ने कहा कि आमिर खान प्रोडक्शन लिमिटेड की फिल्म “पीपली लाइव” में कर्ज से डूबे तंगहाल और असहाय किसान परिवार का जो चित्रण किया है उसका प्रस्तुतीकरण बड़ा ही गलत है। महज दो घंटे के मनोरंजन की कीमत के रूप में हमारे अन्नदाता किसानों का उपहास करती और उनका
मखौल उड़ाती यह फिल्म भले ही दाम और नाम कमा ले किन्तु ऐसी फिल्मो का बहिष्कार होना चाहिए नहीं तो समाज के अन्य दबे कुचले वर्गों की अस्मिता को मनोरंजन की सामग्री बनाते हुए भविष्य में ऐसी और भी फिल्मे बनेंगी ।
नत्था नामक बुन्देलखंडी किसान को धन के लोभ में आकर आत्महत्या करने की लालसा वाला दिखाकर फिल्मकार ने सिद्ध करना चाहा है कि बुंदेलखंड में पिछले वर्षों में किसानों द्वारा जो आत्महत्याएं हुईं वे मुआवजे के लिए हुईं । फिल्म निर्माता की इस सोच ने बुंदेलखंड तथा विदर्भ के उन गरीब परिवारों की आत्मा को झकझोर दिया है जिनके परिवारीजन सूखा और भुखमरी से हारकर मौत को गले लगा बैठे थे । संजय पाण्डेय ने कहा कि आमिर का यह तर्क कि उन्होंने इस फिल्म के माध्यम से मीडिया और राजनेताओं की खिचाई की है तो वे आमिर खान से पूछना चाहेंगे कि उन्होंने अपने इस प्रयोजन को पूरा करने के लिए एक लाचार किसान की इज्जत पर कीचड़ क्यों उछाला ? मीडिया और राजनेताओं को बेनकाब करने के लिए कोई और विषय भी तो लिया जा सकता था !!
ऑस्कर पाने की कामना पाल बैठे आमिर खान ने भूलवश या जानबूझ कर एक किसान के अहम् का जो मजाक उड़ाया है वह अक्षम्य है। उनकी इस फिल्म “पीपली लाइव” में यह सिद्ध करने की धूर्तता पूर्ण कोशिश की गयी है कि बुंदेलखंड के किसानों ने या तो पैसे के लिए आत्महत्या की है या फिर स्थानीय नेताओं के दबाव में आकर । किन्तु वास्तविकता यह नहीं है। सच्चाई यह है कि इन किसानों ने सरकारी नीतियों के साथ साथ प्रकृति से बुरी तरह हताश होकर आत्मघाती कदम उठाये ।
फिल्म में एक जगह मुख्यमंत्री द्वारा यह घोषणा करवाना कि “आत्महत्या के इच्छुक किसानों को एक एक लाख रुपये दिए जायेंगे”, इससे समाज में आत्मघाती प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलेगा।
फिल्म का नायक नत्था जब आत्महत्या की घोषणा करता है तो उसका बेटा कहता है कि पापा जल्दी मरो क्योंकि मुवावजे के पैसे से मुझे ठेकेदार या थानेदार बनना है , यह दिखाकर फ़िल्मकार ने बुन्देली संस्कारों पर तोड़ मरोड़ कर प्रहार किया है कि यहाँ पर बेटों के लिए बाप के मरने का दुःख मुवावजा मिलने की ख़ुशी के सामने फीका है। इतना है नहीं जब झूठी हवा उडती है कि नत्था मर गया है तो उसकी बीबी , माँ और भाई एक भी आंसू बहाने की बजाये पैसे मिलने के सपने देखने लगते हैं। बल्कि नत्था की बीबी पोस्टमोर्टेम के दिन ही अपने जेठ बुधिया से पूछती है , “काये भओ कछू जुगाड़ ” यानि कुछ पैसा वैसा मिला क्या ? यानि कुल मिलाकर यह फिल्म “पीपली लाइव” हमारे किसानों के सम्मान की विरोधी तो है ही साथ ही भारतीय मूल्यों के विपरीत है। जय जवान, जय किसान वाले देश में इस फिल्म के बाद निश्चित रूप से किसान की छवि पर आंच आएगी । इसके लिए आमिर खान के साथ साथ हमारा सेंसर बोर्ड भी दोषी है। संजय पाण्डेय ने अपील की कि किसानों के सम्मान की कीमत पर हमें अपना मनोरंजन नहीं करना चाहिए अर्थात हमें ऐसी फिल्मों का वहिष्कार करना चाहिए।
केंद्र सरकार राजी, मायावती राजी, फिर बुंदेलखंड के निर्माण में देरी क्यों?
जनवरी 23, 2010 at 5:46 अपराह्न (बुंदेलखंड, bundelkhand, mayawati, rahul gandhi, sanjay pandey)
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नई दिल्ली: ‘बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी’ के संयोजक संजय पाण्डेय ने यहां ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में आयोजित प्रेस वार्ता में पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा की बुंदेलखंड में अपार खनिज सम्पदा होते हुए भी वह क्षेत्र बदहाल है। इस क्षेत्र को देश के अन्य हिस्सों के समानांतर लाने के लिए त्वरित और केन्द्रित विकास की दरकार है, जो इसे पृथक राज्य बनाये जाने की स्थिति में ही संभव है।
केंद्र तथा उत्तर प्रदेश सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस तथा बसपा की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के खामियाजा बुंदेलखंड के निवासियों को भुगतना पड़ रहा है। केंद्र सरकार यह कह कर कि मायावती राशि का दुरूपयोग करेंगी, बुंदेलखंड के विकास के लिए पर्याप्त राशि नहीं दे रही है। वहीं दूसरी ओर, मायावती केंद्र सरकार से पर्याप्त सहायता न मिलने के आरोप लगाती हैं। निष्कर्ष यही निकलता है पिछले दो वर्षों से केंद्र तथा राज्य सरकार में बुंदेलखंड को लेकर सिर्फ वाग्युद्ध चल रहा है, जमीनी स्तर पर कुछ नहीं किया गया।
पृथक राज्य के मुद्दे पर संजय पांडेय ने कहा कि सरकारें जमकर राजनीति कर रही हैं। केंद्र तथा राज्य सरकारें गेंद एक-दूसरे के पाले में फेंक रही हैं। कभी मायावती केंद्र को चिट्ठी लिखती हैं, तो कभी राहुल गांधी बुंदेलखंड राज्य गठन की खुली वकालत करते नजर आते हैं। पिछले वर्ष तो स्वयं मनमोहन सिंह ने वाराणसी दौरे पर उत्तर प्रदेश के विभाजन की बात रखी थी। इन सबके बावजूद बुंदेलखंड राज्य गठन के लिए संवैधानिक तरीके से पहल करने की बजाए सिर्फ लफ्फाजी की जा रही है। पाण्डेय ने कहा कि पृथक बुंदेलखंड का मुद्दा अब यहां के चार करोड़ लोगों के जीवन-मरण तथा उनकी अस्मिता का मुद्दा बन गया है, जिसके लिए ‘बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी’ निर्णायक लड़ाई के लिए तैयार है।
नए राज्यों का गठन सियासी लाभ-हानि से परे हो : संजय पाण्डेय
दिसम्बर 26, 2009 at 5:12 अपराह्न (बुंदेलखंड, bundelkhand, sanjay pandey)
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नईदिल्ली
। वर्तमान में राज्यों का पुनर्गठन एक ज्वलंत मुद्दा बन गया है विशेषकर तेलंगाना प्रकरण के बाद देश में कई इलाको से अलग सूबों की मांग जोर पकड़ रही है। ऐसे में केंद्र सरकार को इस धर्म संकट से निकलना भी एक बहुत बड़ी चुनौती होगी कि वो किस राज्य की मांग का समर्थन करे और किसको नामंजूर ? हालाँकि यह सच्चाई है कि आज देश में राज्यों के पुनर्गठन की जरूरत है क्योकि तीव्र जनसँख्या वृद्धि के चलते जैसे जैसे राज्यों का आकार बड़ा हो रहा है वैसे वैसे प्रशासनिक दक्षता और विकास दर में कमी आ रही है।
बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के संयोजक संजय पाण्डेय ने कहा कि लग रहा है कि केंद्र सरकार अपना राजनीतिक नफा-नुकसान देखकर राज्यों के गठन पर विचार कर सकती है. किन्तु सरकार को अपना स्वार्थ न देख, राज्य निर्माण के औचित्य, जनभावना और अपरिहार्यता को देख निर्णय ले लेना चाहिये. यद्यपि देश में कई प्रान्तों के गठन की मांग चल रही है किन्तु बुंदेलखंड, तेलंगाना तथा विदर्भ जैसे इलाके वास्तव में प्रान्त बनाये जाने की पात्रता रखते हैं .आजादी के बाद से ही उपेक्षित पड़े इन अति पिछड़े क्षेत्रो को आज केन्द्रित विकास की दरकार है जो कि पृथक प्रान्त बनाये जाने पर निश्चित रूप से संभव होगा. पर कुछ राज्यों की मांग देखा देखी तथा होड़ में आकर उठने लगी है उनपर सरकार को तटस्थ रहना होगा. जैसे कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश अपने आप में संपन्न क्षेत्र है इसलिए इसका अलग राज्य बनाया जाना अनिवार्य नहीं है इसे टाला जाना चाहिये. इतना जरूर है की जिन क्षेत्रों की मांग सरकार ठुकराएगी वहां का जनमत सरकार के खिलाफ हो सकता है लेकिन सरकार को यह न देखते हुए अपनी मजबूत इच्छा शक्ति का परिचय देते हुए उचित मांगों पर ही विचार करना चाहिये. हाँ, अब औचित्य पूर्ण राज्यों के गठन में आनाकानी भी नहीं करना चाहिये.
बुंदेलखंड मसले पर सरकारे स्पष्ट करें अपना रुख : संजय पाण्डेय
सितम्बर 10, 2009 at 6:53 पूर्वाह्न (बुंदेलखंड, sanjay pandey, bundelkhand)
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केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों का प्रतिनिधितित्व करने वाले कई वरिष्ठ नेतागण जब बुंदेलखंड आते हैं तो वहां की जनता के बीच में तो पृथक बुंदेलखंड राज्य की खुली वकालत करते है किंतु वापस आते ही इस मुद्दे को भूल जाते हैं। बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी का आरोप है कि गुमराह करने का ऐसा ही क्रम पिछले 50 सालों से चल रहा है । वर्ष 1955 में फजल अली की अध्यक्षता में गठित हुए राज्य पुनर्गठन आयोग की पुरजोर शिफारिश के बावजूद आज तक बुंदेलखंड राज्य का गठन सम्भव नही हो सका। पिछले दो वर्षों से उप्र की मुखिया मायावती अपनी जनसभाओं और रैलियों में बुंदेलखंड राज्य निर्माण की तरफ़ दारी करती हैं किंतु जब इस आशय का विधेयक राज्य विधान सभा से पारित करवाने की बात आती है तो बहन जी पीछे हट जाती हैं । इसी तरह केन्द्र की यूपीए सरकार के प्रमुख नेता गण जिनमे डॉ मनमोहन सिंह तथा राहुल गाँधी स्वयं को पृथक बुंदेलखंड राज्य का हिमायती तो बताते हैं किंतु सरकार कोई संसदीय पहल नही कर रही। पार्टी संयोजक संजय पाण्डेय ने कहा कि ऐसे हालातों में यही निष्कर्ष निकलता है कि बुंदेलखंड मसले पर पूर्व की तरह सिर्फ़ बयान बाजी से काम चलाया जा रहा है। कहा कि यद्यपि राहुल गाँधी जी में बुंदेलखंड के प्रति कुछ करने की कसक है ,किंतु उनकी सोच का क्रियान्वयन भी तो जरूरी है। सोचने या बयान देने मात्र से बुंदेलखंड की समस्या का हल तो नही हो सकता।
मप्र तथा उप्र के बीच फंसे बुंदेलखंड क्षेत्र की चिर उपेक्षा का परिणाम है कि यह आज देश के सबसे पिछडे क्षेत्रों में से एक है। किंतु इसके पृथक राज्य बनने के बाद यहाँ केंद्रित विकास होने से स्थिति में सुधार आएगा । इसलिए सरकारें इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर हीला हवाली न करते हुए जल्द अपना रुख स्पष्ट करें । पाण्डेय ने बुंदेलखंड वासियों से भी पलायन और आत्महत्या का रास्ता छोड़ अपने अधिकारों के लिए क्रांति अख्तियार करने की अपील की।
सूखा पीड़ित किसानों को सीधी सहायता मुहैया कराये सरकार : संजय पाण्डेय
अगस्त 30, 2009 at 1:23 अपराह्न (बुंदेलखंड, sanjay pandey, bundelkhand)
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झाँसी । बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के संयोजक संजय पाण्डेय ने यहाँ एक कार्यक्रम में कहा कि आज बुन्देलखण्ड के किसानो को सीधी और त्वरित सहायता की जरूरत है। सूखा राहत के नाम पर विभिन्न योजनाओ में जमकर बन्दर बाँट होता है , इसलिए पात्र किसानों को समय से और उचित मात्रा में राहत राशिः नही पहुँच पाती है। केन्द्र सरकार से मांग करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य सरकारों को पैकेज न देकर जिलाधिकारियों के माध्यम से किसानों को सीधी सहायता मुहैया करायी जाए। ये पहले ही सिद्ध हो चुका है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने ऐसी राहत राशियों का जमकर दुरूपयोग किया है।लिहाजा अब पुनरावृत्ति से बचा जाना चाहिए। दूसरी ओर पाण्डेय ने यह भी कहा कि सूखा राहत मिलने के नियम कानून इतने जटिल होते है कि आम आदमी उन्हें समझ नही पाता है , इसलिए ऐसे में वह जान ही नही पाता है कि उसे कितनी राशि मिलनी चाहिए , फलस्वरूप उसे जो भी मिलता है वह उतने से ही संतुष्टि कर लेता है। अतः राहत देने का फार्मूला आसान हो । कहा कि बुन्देलखंड में सूखा पीड़ित किसानो द्वारा आत्म हत्याओं का सिलसिला शुरू हो चुका है इसलिए और मौतों का इंतजार न करते हुए सरकार को जल्द ही सहायता की सोचनी चाहिए। श्री पाण्डेय ने कहा कि वैसे तो इस वर्ष पूरे भारत में ही सूखे जैसी स्थिति बनी हुई है किंतु बुन्देलखंड कि स्तिथि इसलिए हटकर है क्योंकि यहाँ सूखा का पहला साल नही बल्कि पिछले पॉँच वर्षों से यही हालत है। इसलिए सरकार को बुन्देलखंड के किसानो के बारे में प्राथमिकता से सोचना होगा। राहत प्रदान करते समय भी बुन्देलखंड के किसानो को देश के अन्य हिस्सों के किसानो से तुलना न करते हुए विशेष अधिभार दिया जाए। बताया कि बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी यहाँ के किसानों की समस्याओं को लेकर विशाल आन्दोलन शुरू करने जा रही है
बुंदेलखंड : घटता जल-स्तर,जबाब देते कुए और हेंडपंप
जून 22, 2009 at 6:08 अपराह्न (बुंदेलखंड, bundelkhand, sanjay pandey)
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जैसे जैसे मानसून में देरी हो रही है वैसे वैसे बुन्देलखंड के लोगो और जानवरों की जिजीविषा दम तोड़ रही है। असल में पिछले कई वर्षो के सूखे का सामना कर चुके बुन्देलखंड वासी पुनरावृत्ति नही चाहते है ,किंतु धीरे धीरे हालात वैसे ही बनते जा रहे है। भीषण गर्मी में पेयजल संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है। बुन्देलखंड के सभी जिलों में लोगों का पेयजल के लिये संघर्ष जारी है। सुबह से ही हैण्डपंपों पर पानी भरने वालों की लंबी लाइन लग जाती है और यह सिलसिला देर रात तक अनवरत जारी रहता है। बड़ों की छोड़े बच्चे भी पानी की जुगाड़ के लिये परेशान रहते है। प्रचंड गर्मी में जानवरों को भी अपना गला तर करने के लिये खासी मशक्कत करना पड़ रही है।उमस भरी गर्मी में पेयजल संकट विकराल होता जा रहा है। जलस्तर नीचे खिसकने से कुएं व हैण्डपंप भी धीरे-धीरे साथ छोड़ रहे है। जहां हैण्डपंप सही है वहां पानी भरने वालों की लंबी लाइन लगती है। जो एक बार पानी भर लेता है उसका नंबर फिर घंटों बाद ही आ पाता ।सर्वाधिक परेशानी चित्रकूट के पाठा क्षेत्र, महोबा और जालौन में है।कई जगह ऊंचाई वाले इलाके होने के कारण जल संस्थान की आपूर्ति भी नहीं पहुंच पाती। जिससे यहां के वाशिंदे पूरी तरह हैण्डपंपों पर आश्रित है। हैण्डपंपों में पानी भरने वालों की काफी भीड़ जमा होती है। सुबह 4 बजे से ही लोग हैण्डपंप से पानी भरने लगते है और यह सिलसिला देर रात तक जारी रहता है। जहाँ जल संस्थान द्वारा टैंकरों से जलापूर्ति दी जा रही वहां कुछ प्रभावशाली लोग उसमें अपना कब्जा जमा लेते है। आम लोगों का नंबर आते-आते टैंकर खाली हो जाता है। जिससे पेयजल के लिये खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। कमोवेश यही हाल समूचे बुन्देलखंड का है। आमजन की तो छोड़े जानवरों को भी गला तर करने को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। उनके लिये चरही तो बनाई गई मगर उनमें पानी नहीं भरा गया। बेचारे बेजबान जानवर अपनी प्यास बुझाने को दर-दर भटकते रहते है। बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के संजय पाण्डेय प्रदेश सरकार पर आरोप मढ़ते हुए कहते है कि एक बार लम्बा सूखा झेल चुके बुंदेलखंड क्षेत्र में सूखे से निपटने के लिए इस साल भी सरकार ने पूर्व तयारी नहीं की है.
बजट-सत्र के दौरान संसद के समक्ष होगा प्रदर्शन
जून 21, 2009 at 6:43 अपराह्न (बुंदेलखंड, bundelkhand, sanjay pandey)
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पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग बुलंद करने के लिए जुलाई में आगामी बजट सत्र के दौरान बुन्देलखण्ड एकीकृत पार्टी के हजारों कार्यकर्त्ता दिल्ली में संसद मार्ग पर जोर दार हल्ला बोलेंगे । धरना प्रदर्शन के उपरांत पार्टी कार्यकर्त्ता प्रधान मंत्री डा. मनमोहन सिंह को ज्ञापन देकर यूपीए सरकार से मांग करेंगे कि पृथक बुन्देलखंड राज्य की मांग को अमली जमा पहनाने के लिए संसद में इस आशय का अधिनियम पारित करवाने के लिए संवैधानिक कार्यवाही आरम्भ की जाये.
“गरीब दलितों की भावनाओं पर डकैती” डालने के लिए राहुल गाँधी के स्वांग
जून 18, 2009 at 7:21 पूर्वाह्न (बुंदेलखंड, sanjay pandey, bundelkhand, rahul gandhi)
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बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक संजय पाण्डेय ने राहुल गाँधी के जन्म दिन पर दलितों के साथ कांग्रेसियों के सहभोज(साथ बैठकर भोजन ) को “गरीब दलितों की भावनाओं पर डकैती” करार दिया। पाण्डेय ने कहा कि समाज में गरीब ही सबसे भावुक होता है ,इसलिए उसकी भावनाओं से खिलवाड़ करना आसान समझकर “राहुल गाँधी एंड कंपनी” गरीब दलितों के घरों को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला के लिए बेहद सस्ती ज़मीन समझ रहे हैं। गरीब के घर कांग्रेसियों के भोजन करने मात्र से उन्हें बराबरी का दर्जा नही मिल जाएगा , बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से बराबरी प्रदान करनी होगी । नौटंकी करने के बजाए उनकी बदहाली दूर करने की योजनाये बनानी होगी । सच तो यह है कि आधी सदी तक के शासन में कांग्रेस ने गरीबी उन्मूलन और दलित उत्थान की दिशा में जो प्रयास किए वे ऊंट के मुह में जीरा की तरह हैं। दरअसल “कोट-पेंट और सूटकेश संस्कृति ” वाली कांग्रेस पार्टी में योजनाकारों की भूमिका में सदैव राजा-महाराजा और किताबी अर्थशास्त्री ही रहे हैं, जो न तो गरीबी से परिचित है और न ही गरीब से।ठीक उसी तरह बसपा ने भी स्वयं को दलितों और गरीबों की रहनुमा बताकर उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया ।उनका थोक वोट बैंक तो लिया पर उनका उत्थान नही चाहा। और तो और घोषित रूप से दलितों की पार्टी (बसपा) का टिकट भी हर चुनाव में ऐसे अमीरों को दिया जाता है जो बहन जी पर करोडो रूपए न्योछावर कर दे। कुल मिलाकर इस देश में दलितों के हितैषी दिखने के लिए स्वांग रचने की स्पर्धा तो चलती है पर उनको ऊपर उठाना कोई नही चाहता। असल में भारत की राजनीति में “गरीब” ही सदैव से राजनीतिक सामग्री रहा है । शायद इसलिए कोई नेता नही चाहता कि गरीबी हटे क्योंकि यदि गरीबी हट गयी तो राजनीति की विषय-वस्तु ही खत्म हो जायेगी ।पिछले वर्ष बुंदेलखंड के दौरे पर आए राहुल गाँधी ने एक दलित परिवार के घर खाना खाकर जाताना चाहा कि वे और उनकी पार्टी ही निम्नवर्ग के सबसे बड़े हितैषी है । किंतु मै राहुल से पूछता हूँ कि बुन्देलखंड क्षेत्र से लाखो लोग पलायन करके उसी दिल्ली में नारकीय जीवन जी रहे है जहाँ राहुल गाँधी स्थाई रूप से रहते हैं, क्या उन लोगों की सुध लेने कभी किसी झुग्गी पर राहुल गाँधी पहुचे?क्या इन्ही मजदूरों में से किसी को दस जनपथ ले जाकर साथ में भोजन करवाया? इतना तो बहुत दूर की बात, किसी मजदूर की औकात तक नही कि वह दस जनपथ में प्रवेश भी पा जाए। मीडिया की उपस्थिति में दलित के घर बैठकर और बड़ी बड़ी फोटो खिचवाकर नेताओ का तो भला हो सकता है मगर गरीब का नही। राहुल गाँधी “शबरी ” के घर भोजन करके “राम” तो बनना चाहते है पर सिर्फ़ मीडिया कवरेज के लिए । पर नयी पीढी के नेताओं को नौटंकियाँ छोड़कर निष्कपट भाव से दबे-कुचलों को साथ लेकर राम के आदर्शों पर चलकर वास्तव में राम -राज स्थापित करने की पहल करनी होगी । साथ ही देश के गरीब ,दलितों को भी मायावती और राहुल गाँधी जैसे छद्म वेशधारी नौटंकीबाज कलाकारों की हकीकत जाननी होगी ।
मुस्लिम वोटों के एक तरफा ध्रुवीकरण के कारण दोबारा सत्ता में आयी कांग्रेस : संजय पाण्डेय
जून 11, 2009 at 4:28 अपराह्न (बुंदेलखंड, sanjay pandey, bundelkhand, rahul gandhi, varun gandhi)
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बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी संयोजक संजय पाण्डेय ने कहा कि आज भारतीय राजनीति में राहुल गाँधी के तिलिस्म को प्रमाणिकता प्रदान करने के लिए कांग्रेस के बड़े बड़े रणनीतिकार ही नही बल्कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग और मीडिया, सभी यूपीए की जीत का श्रेय राहुल गाँधी को दे रहे हैं। किंतु ये लोग कांग्रेस को मिली आशातीत सफलता के मूल कारण तक नही पहुँच पा रहे हैं या फ़िर वे जानते हुए भी सही बात न कहकर राहुल की चमचागिरी करने के लिए ही उनके नाम और काम को जीत का कारण बता रहे हैं। सच तो यह है कि जो कांग्रेस मुस्लिम वोटों के एक तरफा ध्रुवीकरण के कारण दोबारा सत्ता में आयी है वह कांग्रेस शायद ग़लतफ़हमी में है। मुसलमानों ने कांग्रेस की नीतियों और उसके द्वारा किए गए कार्यों से खुश होकर नही बल्कि अतिवादी भाजपा को निपटाने के लिए मजबूरी वश कांग्रेस को वोट दिया। हालाँकि मुसलमानों का वोट सपा,बसपा और अन्य दलों में बँटने जा रहा था किंतु वरुण गाँधी के सांप्रदायिक भाषणों से जो उन्मादी स्थिति उत्पन्न हुई उससे भारतीय मुस्लमान एकजुट हो गए। अब सोचिये जब 25 करोड़ लोग यानि एक-चौथाई देश एकजुट हो जाएगा तो कुछ तो गुल खिलेगा ही। पर भाजपा ने वरुण को रातों रात हीरो मान लिया या यू कहे कि भूलवश वरुण को सत्ता दिलाऊ व्यक्तित्व समझकर लोक सभा चुनाओं में स्टार प्रचारक बना दिया तो स्थिति बद से बदतर हो गई । वरुण ने सैकडों चुनावी जन सभाओं में भी सांप्रदायिक जहर उगलना जारी रखा और भाजपा ग़लत फहमी में रही कि राम मन्दिर मुद्दे कि तरह वरुण मसला भी हिन्दू मतों को एकजुट करेगा । परिणाम उल्टा ही रहा। हिंदू तो एकजुट नही हुआ पर मुस्लिम समाज जरूर एकजुट हो गया। यदि वरुण मामला न घटित होता तो इस बार मुस्लिम वोट सबसे अधिक विखराव की स्थिति में था । जिनमे से सपा, बसपा, रालोद, राजद, लोजपा और अन्य दर्जनों पार्टियों में जो मुस्लित-मत बिभाजित होने जा रहा था वो यह सोचकर कांग्रेस के पाले में चला गया कि कही चुनाव बाद ये छोटे दल भाजपा को सत्ता दिलाने में सहयोगी न बन जायें। इसलिए अपने पसंदीदा छोटे दलों को भी नकारकर वे कांग्रेस के साथ होने का मन बना चुके थे ,उनकी इस मंशा पर एन वक्त पर उलेमाओ की इस अपील ने भी अन्तिम मोहर लगा दी कि सारे मुस्लमान कांग्रेस पार्टी को ही वोट दे। इसलिए कांग्रेस को इतनी सीटें मिलगई जितनी कि स्वयं कांग्रेस भी मान कर नही चल रही थी । उक्त तथ्यों को आधार मानकर यही कहा जा सकता है कि इस जीत के पीछे उनके युवराज राहुल गाँधी नही बल्कि भाजपा के तथा कथित हीरो वरुण गाँधी हैं. एक बात तो है, दिमाग बहुत है गाँधी परिवार के लोगो में . एक ऑर वरुण ने यह नाटक करके अपनी और अपनी माँ मेनका की सीट जिता ली ,दूसरी और अपनी ताई सोनिया जी की मुश्किलें आसान करदी. आज देश का एक तबका तो शायद यह भी सोच रहा होगा कि कही यह “गाँधी -बंधुओं” की मिली भगत तो नही ?
