December 26, 2009 at 5:12 pm (bundelkhand, sanjay pandey, बुंदेलखंड)
Tags: अलग राज्य, बुंदेलखंड, बुंदेलखंड प्रांत, बुंदेलखण्ड एकीकृत पार्टी, बुन्देलखंड, बुन्देलखण्ड, bundelkhand, sanjay pandey

sanjay pandey
नईदिल्ली
। वर्तमान में राज्यों का पुनर्गठन एक ज्वलंत मुद्दा बन गया है विशेषकर तेलंगाना प्रकरण के बाद देश में कई इलाको से अलग सूबों की मांग जोर पकड़ रही है। ऐसे में केंद्र सरकार को इस धर्म संकट से निकलना भी एक बहुत बड़ी चुनौती होगी कि वो किस राज्य की मांग का समर्थन करे और किसको नामंजूर ? हालाँकि यह सच्चाई है कि आज देश में राज्यों के पुनर्गठन की जरूरत है क्योकि तीव्र जनसँख्या वृद्धि के चलते जैसे जैसे राज्यों का आकार बड़ा हो रहा है वैसे वैसे प्रशासनिक दक्षता और विकास दर में कमी आ रही है।
बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के संयोजक संजय पाण्डेय ने कहा कि लग रहा है कि केंद्र सरकार अपना राजनीतिक नफा-नुकसान देखकर राज्यों के गठन पर विचार कर सकती है. किन्तु सरकार को अपना स्वार्थ न देख, राज्य निर्माण के औचित्य, जनभावना और अपरिहार्यता को देख निर्णय ले लेना चाहिये. यद्यपि देश में कई प्रान्तों के गठन की मांग चल रही है किन्तु बुंदेलखंड, तेलंगाना तथा विदर्भ जैसे इलाके वास्तव में प्रान्त बनाये जाने की पात्रता रखते हैं .आजादी के बाद से ही उपेक्षित पड़े इन अति पिछड़े क्षेत्रो को आज केन्द्रित विकास की दरकार है जो कि पृथक प्रान्त बनाये जाने पर निश्चित रूप से संभव होगा. पर कुछ राज्यों की मांग देखा देखी तथा होड़ में आकर उठने लगी है उनपर सरकार को तटस्थ रहना होगा. जैसे कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश अपने आप में संपन्न क्षेत्र है इसलिए इसका अलग राज्य बनाया जाना अनिवार्य नहीं है इसे टाला जाना चाहिये. इतना जरूर है की जिन क्षेत्रों की मांग सरकार ठुकराएगी वहां का जनमत सरकार के खिलाफ हो सकता है लेकिन सरकार को यह न देखते हुए अपनी मजबूत इच्छा शक्ति का परिचय देते हुए उचित मांगों पर ही विचार करना चाहिये. हाँ, अब औचित्य पूर्ण राज्यों के गठन में आनाकानी भी नहीं करना चाहिये.
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September 10, 2009 at 6:53 am (bundelkhand, sanjay pandey, बुंदेलखंड)
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केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों का प्रतिनिधितित्व करने वाले कई वरिष्ठ नेतागण जब बुंदेलखंड आते हैं तो वहां की जनता के बीच में तो पृथक बुंदेलखंड राज्य की खुली वकालत करते है किंतु वापस आते ही इस मुद्दे को भूल जाते हैं। बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी का आरोप है कि गुमराह करने का ऐसा ही क्रम पिछले 50 सालों से चल रहा है । वर्ष 1955 में फजल अली की अध्यक्षता में गठित हुए राज्य पुनर्गठन आयोग की पुरजोर शिफारिश के बावजूद आज तक बुंदेलखंड राज्य का गठन सम्भव नही हो सका। पिछले दो वर्षों से उप्र की मुखिया मायावती अपनी जनसभाओं और रैलियों में बुंदेलखंड राज्य निर्माण की तरफ़ दारी करती हैं किंतु जब इस आशय का विधेयक राज्य विधान सभा से पारित करवाने की बात आती है तो बहन जी पीछे हट जाती हैं । इसी तरह केन्द्र की यूपीए सरकार के प्रमुख नेता गण जिनमे डॉ मनमोहन सिंह तथा राहुल गाँधी स्वयं को पृथक बुंदेलखंड राज्य का हिमायती तो बताते हैं किंतु सरकार कोई संसदीय पहल नही कर रही। पार्टी संयोजक संजय पाण्डेय ने कहा कि ऐसे हालातों में यही निष्कर्ष निकलता है कि बुंदेलखंड मसले पर पूर्व की तरह सिर्फ़ बयान बाजी से काम चलाया जा रहा है। कहा कि यद्यपि राहुल गाँधी जी में बुंदेलखंड के प्रति कुछ करने की कसक है ,किंतु उनकी सोच का क्रियान्वयन भी तो जरूरी है। सोचने या बयान देने मात्र से बुंदेलखंड की समस्या का हल तो नही हो सकता।
मप्र तथा उप्र के बीच फंसे बुंदेलखंड क्षेत्र की चिर उपेक्षा का परिणाम है कि यह आज देश के सबसे पिछडे क्षेत्रों में से एक है। किंतु इसके पृथक राज्य बनने के बाद यहाँ केंद्रित विकास होने से स्थिति में सुधार आएगा । इसलिए सरकारें इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर हीला हवाली न करते हुए जल्द अपना रुख स्पष्ट करें । पाण्डेय ने बुंदेलखंड वासियों से भी पलायन और आत्महत्या का रास्ता छोड़ अपने अधिकारों के लिए क्रांति अख्तियार करने की अपील की।
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August 30, 2009 at 1:23 pm (bundelkhand, sanjay pandey, बुंदेलखंड)
Tags: बुंदेलखंड, बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी, संजय पाण्डेय, बुन्देलखण्ड, bundelkhand, बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी, सूखा, किसान, राहत, drought
झाँसी । बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के संयोजक संजय पाण्डेय ने यहाँ एक कार्यक्रम में कहा कि आज बुन्देलखण्ड के किसानो को सीधी और त्वरित सहायता की जरूरत है। सूखा राहत के नाम पर विभिन्न योजनाओ में जमकर बन्दर बाँट होता है , इसलिए पात्र किसानों को समय से और उचित मात्रा में राहत राशिः नही पहुँच पाती है। केन्द्र सरकार से मांग करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य सरकारों को पैकेज न देकर जिलाधिकारियों के माध्यम से किसानों को सीधी सहायता मुहैया करायी जाए। ये पहले ही सिद्ध हो चुका है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने ऐसी राहत राशियों का जमकर दुरूपयोग किया है।लिहाजा अब पुनरावृत्ति से बचा जाना चाहिए। दूसरी ओर पाण्डेय ने यह भी कहा कि सूखा राहत मिलने के नियम कानून इतने जटिल होते है कि आम आदमी उन्हें समझ नही पाता है , इसलिए ऐसे में वह जान ही नही पाता है कि उसे कितनी राशि मिलनी चाहिए , फलस्वरूप उसे जो भी मिलता है वह उतने से ही संतुष्टि कर लेता है। अतः राहत देने का फार्मूला आसान हो । कहा कि बुन्देलखंड में सूखा पीड़ित किसानो द्वारा आत्म हत्याओं का सिलसिला शुरू हो चुका है इसलिए और मौतों का इंतजार न करते हुए सरकार को जल्द ही सहायता की सोचनी चाहिए। श्री पाण्डेय ने कहा कि वैसे तो इस वर्ष पूरे भारत में ही सूखे जैसी स्थिति बनी हुई है किंतु बुन्देलखंड कि स्तिथि इसलिए हटकर है क्योंकि यहाँ सूखा का पहला साल नही बल्कि पिछले पॉँच वर्षों से यही हालत है। इसलिए सरकार को बुन्देलखंड के किसानो के बारे में प्राथमिकता से सोचना होगा। राहत प्रदान करते समय भी बुन्देलखंड के किसानो को देश के अन्य हिस्सों के किसानो से तुलना न करते हुए विशेष अधिभार दिया जाए। बताया कि बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी यहाँ के किसानों की समस्याओं को लेकर विशाल आन्दोलन शुरू करने जा रही है
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June 22, 2009 at 6:08 pm (bundelkhand, sanjay pandey, बुंदेलखंड)
Tags: बुंदेलखंड, बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी, संजय पाण्डेय, पानी, गर्मी, हैण्डपंप, पेयजल संकट, जल संस्थान, पेयजल, सूखा
जैसे जैसे मानसून में देरी हो रही है वैसे वैसे बुन्देलखंड के लोगो और जानवरों की जिजीविषा दम तोड़ रही है। असल में पिछले कई वर्षो के सूखे का सामना कर चुके बुन्देलखंड वासी पुनरावृत्ति नही चाहते है ,किंतु धीरे धीरे हालात वैसे ही बनते जा रहे है। भीषण गर्मी में पेयजल संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है। बुन्देलखंड के सभी जिलों में लोगों का पेयजल के लिये संघर्ष जारी है। सुबह से ही हैण्डपंपों पर पानी भरने वालों की लंबी लाइन लग जाती है और यह सिलसिला देर रात तक अनवरत जारी रहता है। बड़ों की छोड़े बच्चे भी पानी की जुगाड़ के लिये परेशान रहते है। प्रचंड गर्मी में जानवरों को भी अपना गला तर करने के लिये खासी मशक्कत करना पड़ रही है।उमस भरी गर्मी में पेयजल संकट विकराल होता जा रहा है। जलस्तर नीचे खिसकने से कुएं व हैण्डपंप भी धीरे-धीरे साथ छोड़ रहे है। जहां हैण्डपंप सही है वहां पानी भरने वालों की लंबी लाइन लगती है। जो एक बार पानी भर लेता है उसका नंबर फिर घंटों बाद ही आ पाता ।सर्वाधिक परेशानी चित्रकूट के पाठा क्षेत्र, महोबा और जालौन में है।कई जगह ऊंचाई वाले इलाके होने के कारण जल संस्थान की आपूर्ति भी नहीं पहुंच पाती। जिससे यहां के वाशिंदे पूरी तरह हैण्डपंपों पर आश्रित है। हैण्डपंपों में पानी भरने वालों की काफी भीड़ जमा होती है। सुबह 4 बजे से ही लोग हैण्डपंप से पानी भरने लगते है और यह सिलसिला देर रात तक जारी रहता है। जहाँ जल संस्थान द्वारा टैंकरों से जलापूर्ति दी जा रही वहां कुछ प्रभावशाली लोग उसमें अपना कब्जा जमा लेते है। आम लोगों का नंबर आते-आते टैंकर खाली हो जाता है। जिससे पेयजल के लिये खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। कमोवेश यही हाल समूचे बुन्देलखंड का है। आमजन की तो छोड़े जानवरों को भी गला तर करने को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। उनके लिये चरही तो बनाई गई मगर उनमें पानी नहीं भरा गया। बेचारे बेजबान जानवर अपनी प्यास बुझाने को दर-दर भटकते रहते है। बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के संजय पाण्डेय प्रदेश सरकार पर आरोप मढ़ते हुए कहते है कि एक बार लम्बा सूखा झेल चुके बुंदेलखंड क्षेत्र में सूखे से निपटने के लिए इस साल भी सरकार ने पूर्व तयारी नहीं की है.
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June 21, 2009 at 6:43 pm (bundelkhand, sanjay pandey, बुंदेलखंड)
Tags: अधिनियम, डा. मनमोहन सिंह, धरना प्रदर्शन, पृथक बुंदेलखंड राज्य, बुंदेलखंड, बुंदेलखण्ड एकीकृत पार्टी, संजय पाण्डेय, संसद
पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग बुलंद करने के लिए जुलाई में आगामी बजट सत्र के दौरान बुन्देलखण्ड एकीकृत पार्टी के हजारों कार्यकर्त्ता दिल्ली में संसद मार्ग पर जोर दार हल्ला बोलेंगे । धरना प्रदर्शन के उपरांत पार्टी कार्यकर्त्ता प्रधान मंत्री डा. मनमोहन सिंह को ज्ञापन देकर यूपीए सरकार से मांग करेंगे कि पृथक बुन्देलखंड राज्य की मांग को अमली जमा पहनाने के लिए संसद में इस आशय का अधिनियम पारित करवाने के लिए संवैधानिक कार्यवाही आरम्भ की जाये.
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June 18, 2009 at 7:21 am (bundelkhand, rahul gandhi, sanjay pandey, बुंदेलखंड)
Tags: बुंदेलखंड, बुन्देलखण्ड, संजय पाण्डेय, rahul gandhi, sanjay pandey
बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक संजय पाण्डेय ने राहुल गाँधी के जन्म दिन पर दलितों के साथ कांग्रेसियों के सहभोज(साथ बैठकर भोजन ) को “गरीब दलितों की भावनाओं पर डकैती” करार दिया। पाण्डेय ने कहा कि समाज में गरीब ही सबसे भावुक होता है ,इसलिए उसकी भावनाओं से खिलवाड़ करना आसान समझकर “राहुल गाँधी एंड कंपनी” गरीब दलितों के घरों को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला के लिए बेहद सस्ती ज़मीन समझ रहे हैं। गरीब के घर कांग्रेसियों के भोजन करने मात्र से उन्हें बराबरी का दर्जा नही मिल जाएगा , बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से बराबरी प्रदान करनी होगी । नौटंकी करने के बजाए उनकी बदहाली दूर करने की योजनाये बनानी होगी । सच तो यह है कि आधी सदी तक के शासन में कांग्रेस ने गरीबी उन्मूलन और दलित उत्थान की दिशा में जो प्रयास किए वे ऊंट के मुह में जीरा की तरह हैं। दरअसल “कोट-पेंट और सूटकेश संस्कृति ” वाली कांग्रेस पार्टी में योजनाकारों की भूमिका में सदैव राजा-महाराजा और किताबी अर्थशास्त्री ही रहे हैं, जो न तो गरीबी से परिचित है और न ही गरीब से।ठीक उसी तरह बसपा ने भी स्वयं को दलितों और गरीबों की रहनुमा बताकर उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया ।उनका थोक वोट बैंक तो लिया पर उनका उत्थान नही चाहा। और तो और घोषित रूप से दलितों की पार्टी (बसपा) का टिकट भी हर चुनाव में ऐसे अमीरों को दिया जाता है जो बहन जी पर करोडो रूपए न्योछावर कर दे। कुल मिलाकर इस देश में दलितों के हितैषी दिखने के लिए स्वांग रचने की स्पर्धा तो चलती है पर उनको ऊपर उठाना कोई नही चाहता। असल में भारत की राजनीति में “गरीब” ही सदैव से राजनीतिक सामग्री रहा है । शायद इसलिए कोई नेता नही चाहता कि गरीबी हटे क्योंकि यदि गरीबी हट गयी तो राजनीति की विषय-वस्तु ही खत्म हो जायेगी ।पिछले वर्ष बुंदेलखंड के दौरे पर आए राहुल गाँधी ने एक दलित परिवार के घर खाना खाकर जाताना चाहा कि वे और उनकी पार्टी ही निम्नवर्ग के सबसे बड़े हितैषी है । किंतु मै राहुल से पूछता हूँ कि बुन्देलखंड क्षेत्र से लाखो लोग पलायन करके उसी दिल्ली में नारकीय जीवन जी रहे है जहाँ राहुल गाँधी स्थाई रूप से रहते हैं, क्या उन लोगों की सुध लेने कभी किसी झुग्गी पर राहुल गाँधी पहुचे?क्या इन्ही मजदूरों में से किसी को दस जनपथ ले जाकर साथ में भोजन करवाया? इतना तो बहुत दूर की बात, किसी मजदूर की औकात तक नही कि वह दस जनपथ में प्रवेश भी पा जाए। मीडिया की उपस्थिति में दलित के घर बैठकर और बड़ी बड़ी फोटो खिचवाकर नेताओ का तो भला हो सकता है मगर गरीब का नही। राहुल गाँधी “शबरी ” के घर भोजन करके “राम” तो बनना चाहते है पर सिर्फ़ मीडिया कवरेज के लिए । पर नयी पीढी के नेताओं को नौटंकियाँ छोड़कर निष्कपट भाव से दबे-कुचलों को साथ लेकर राम के आदर्शों पर चलकर वास्तव में राम -राज स्थापित करने की पहल करनी होगी । साथ ही देश के गरीब ,दलितों को भी मायावती और राहुल गाँधी जैसे छद्म वेशधारी नौटंकीबाज कलाकारों की हकीकत जाननी होगी ।
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June 11, 2009 at 4:28 pm (bundelkhand, rahul gandhi, sanjay pandey, varun gandhi, बुंदेलखंड)
Tags: बुंदेलखंड, बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी, बुन्देलखण्ड, संजय पाण्डेय, rahul gandhi, sanjay pandey, upa, varun gandhi
बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी संयोजक संजय पाण्डेय ने कहा कि आज भारतीय राजनीति में राहुल गाँधी के तिलिस्म को प्रमाणिकता प्रदान करने के लिए कांग्रेस के बड़े बड़े रणनीतिकार ही नही बल्कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग और मीडिया, सभी यूपीए की जीत का श्रेय राहुल गाँधी को दे रहे हैं। किंतु ये लोग कांग्रेस को मिली आशातीत सफलता के मूल कारण तक नही पहुँच पा रहे हैं या फ़िर वे जानते हुए भी सही बात न कहकर राहुल की चमचागिरी करने के लिए ही उनके नाम और काम को जीत का कारण बता रहे हैं। सच तो यह है कि जो कांग्रेस मुस्लिम वोटों के एक तरफा ध्रुवीकरण के कारण दोबारा सत्ता में आयी है वह कांग्रेस शायद ग़लतफ़हमी में है। मुसलमानों ने कांग्रेस की नीतियों और उसके द्वारा किए गए कार्यों से खुश होकर नही बल्कि अतिवादी भाजपा को निपटाने के लिए मजबूरी वश कांग्रेस को वोट दिया। हालाँकि मुसलमानों का वोट सपा,बसपा और अन्य दलों में बँटने जा रहा था किंतु वरुण गाँधी के सांप्रदायिक भाषणों से जो उन्मादी स्थिति उत्पन्न हुई उससे भारतीय मुस्लमान एकजुट हो गए। अब सोचिये जब 25 करोड़ लोग यानि एक-चौथाई देश एकजुट हो जाएगा तो कुछ तो गुल खिलेगा ही। पर भाजपा ने वरुण को रातों रात हीरो मान लिया या यू कहे कि भूलवश वरुण को सत्ता दिलाऊ व्यक्तित्व समझकर लोक सभा चुनाओं में स्टार प्रचारक बना दिया तो स्थिति बद से बदतर हो गई । वरुण ने सैकडों चुनावी जन सभाओं में भी सांप्रदायिक जहर उगलना जारी रखा और भाजपा ग़लत फहमी में रही कि राम मन्दिर मुद्दे कि तरह वरुण मसला भी हिन्दू मतों को एकजुट करेगा । परिणाम उल्टा ही रहा। हिंदू तो एकजुट नही हुआ पर मुस्लिम समाज जरूर एकजुट हो गया। यदि वरुण मामला न घटित होता तो इस बार मुस्लिम वोट सबसे अधिक विखराव की स्थिति में था । जिनमे से सपा, बसपा, रालोद, राजद, लोजपा और अन्य दर्जनों पार्टियों में जो मुस्लित-मत बिभाजित होने जा रहा था वो यह सोचकर कांग्रेस के पाले में चला गया कि कही चुनाव बाद ये छोटे दल भाजपा को सत्ता दिलाने में सहयोगी न बन जायें। इसलिए अपने पसंदीदा छोटे दलों को भी नकारकर वे कांग्रेस के साथ होने का मन बना चुके थे ,उनकी इस मंशा पर एन वक्त पर उलेमाओ की इस अपील ने भी अन्तिम मोहर लगा दी कि सारे मुस्लमान कांग्रेस पार्टी को ही वोट दे। इसलिए कांग्रेस को इतनी सीटें मिलगई जितनी कि स्वयं कांग्रेस भी मान कर नही चल रही थी । उक्त तथ्यों को आधार मानकर यही कहा जा सकता है कि इस जीत के पीछे उनके युवराज राहुल गाँधी नही बल्कि भाजपा के तथा कथित हीरो वरुण गाँधी हैं. एक बात तो है, दिमाग बहुत है गाँधी परिवार के लोगो में . एक ऑर वरुण ने यह नाटक करके अपनी और अपनी माँ मेनका की सीट जिता ली ,दूसरी और अपनी ताई सोनिया जी की मुश्किलें आसान करदी. आज देश का एक तबका तो शायद यह भी सोच रहा होगा कि कही यह “गाँधी -बंधुओं” की मिली भगत तो नही ?
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May 8, 2009 at 7:26 am (bundelkhand, बुंदेलखंड, स्वतंत्रता आन्दोलन)
Tags: बुंदेलखंड, बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी, बुन्देलखण्ड, संजय पाण्डेय
इतिहास की इबारत गवाही देती है कि हिंदुस्तान की आजादी के प्रथम संग्राम की ज्वाला मेरठ की छावनी में भड़की थी। किन्तु इन ऐतिहासिक तथ्यों के पीछे एक सचाई गुम है, वह यह कि आजादी की लड़ाई शुरू करने वाले मेरठ के संग्राम से भी 15 साल पहले बुन्देलखंड की धर्मनगरी चित्रकूट में एक क्रांति का सूत्रपात हुआ था। पवित्र मंदाकिनी के किनारे गोकशी के खिलाफ एकजुट हुई हिंदू-मुस्लिम बिरादरी ने मऊ तहसील में अदालत लगाकर पांच फिरंगी अफसरों को फांसी पर लटका दिया। इसके बाद जब-जब अंग्रेजों या फिर उनके किसी पिछलग्गू ने बुंदेलों की शान में गुस्ताखी का प्रयास किया तो उसका सिर कलम कर दिया गया। इस क्रांति के नायक थे आजादी के प्रथम संग्राम की ज्वाला मेरठ के सीधे-साधे हरबोले। संघर्ष की दास्तां को आगे बढ़ाने में बुर्कानशीं महिलाओं की ‘घाघरा पलटन’ की भी अहम हिस्सेदारी थी।
आजादी के संघर्ष की पहली मशाल सुलगाने वाले बुन्देलखंड के रणबांकुरे इतिहास के पन्नों में जगह नहीं पा सके, लेकिन उनकी शूरवीरता की तस्दीक फिरंगी अफसर खुद कर गये हैं। अंग्रेज अधिकारियों द्वारा लिखे बांदा गजट में एक ऐसी कहानी दफन है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। गजेटियर के पन्ने पलटने पर मालूम हुआ कि वर्ष 1857 में मेरठ की छावनी में फिरंगियों की फौज के सिपाही मंगल पाण्डेय के विद्रोह से भी 15 साल पहले चित्रकूट में क्रांति की चिंगारी भड़क चुकी थी। दरअसल अतीत के उस दौर में धर्मनगरी की पवित्र मंदाकिनी नदी के किनारे अंग्रेज अफसर गायों का वध कराते थे। गौमांस को बिहार और बंगाल में भेजकर वहां से एवज में रसद और हथियार मंगाये जाते थे। आस्था की प्रतीक मंदाकिनी किनारे एक दूसरी आस्था यानी गोवंश की हत्या से स्थानीय जनता विचलित थी, लेकिन फिरंगियों के खौफ के कारण जुबान बंद थी।
कुछ लोगों ने हिम्मत दिखाते हुए मराठा शासकों और मंदाकिनी पार के ‘नया गांव’ के चौबे राजाओं से फरियाद लगायी, लेकिन दोनों शासकों ने अंग्रेजों की मुखालफत करने से इंकार कर दिया। गुहार बेकार गयी, नतीजे में सीने के अंदर प्रतिशोध की ज्वाला धधकती रही। इसी दौरान गांव-गांव घूमने वाले हरबोलों ने गौकशी के खिलाफ लोगों को जागृत करते हुए एकजुट करना शुरू किया। फिर वर्ष 1842 के जून महीने की छठी तारीख को वह हुआ, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। हजारों की संख्या में निहत्थे मजदूरों, नौजवानों और बुर्कानशीं महिलाओं ने मऊ तहसील को घेरकर फिरंगियों के सामने बगावत के नारे बुलंद किये। खास बात यह थी कि गौकशी के खिलाफ इस आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम बिरादरी की बराबर की भागीदारी थी। तहसील में गोरों के खिलाफ आवाज बुलंद हुई तो बुंदेलों की भुजाएं फड़कने लगीं।देखते-देखते अंग्रेज अफसर बंधक थे, इसके बाद पेड़ के नीचे ‘जनता की अदालत’ लगी और बाकायदा मुकदमा चलाकर पांच अंग्रेज अफसरों को फांसी पर लटका दिया गया। जनक्रांति की यह ज्वाला मऊ में दफन होने के बजाय राजापुर बाजार पहुंची और अंग्रेज अफसर खदेड़ दिये गये। वक्त की नजाकत देखते हुए मर्का और समगरा के जमींदार भी आंदोलन में कूद पड़े। दो दिन बाद 8 जून को बबेरू बाजार सुलगा तो वहां के थानेदार और तहसीलदार को जान बचाकर भागना पड़ा। जौहरपुर, पैलानी, बीसलपुर, सेमरी से अंग्रेजों को खदेड़ने के साथ ही तिंदवारी तहसील के दफ्तर में क्रांतिकारियों ने सरकारी रिकार्डो को जलाकर तीन हजार रुपये भी लूट लिये। आजादी की ज्वाला भड़कने पर गोरी हुकूमत ने अपने पिट्ठू शासकों को हुक्म जारी करते हुए क्रांतिकारियों को कुचलने के लिए कहा। इस फरमान पर पन्ना नरेश ने एक हजार सिपाही, एक तोप, चार हाथी और पचास बैल भेजे, छतरपुर की रानी व गौरिहार के राजा के साथ ही अजयगढ़ के राजा की फौज भी चित्रकूट के लिए कूच कर चुकी थी। दूसरी ओर बांदा छावनी में दुबके फिरंगी अफसरों ने बांदा नवाब से जान की गुहार लगाते हुए बीवी-बच्चों के साथ पहुंच गये। इधर विद्रोह को दबाने के लिए बांदा-चित्रकूट पहुंची भारतीय राजाओं की फौज के तमाम सिपाही भी आंदोलनकारियों के साथ कदमताल करने लगे। नतीजे में उत्साही क्रांतिकारियों ने 15 जून को बांदा छावनी के प्रभारी मि. काकरेल को पकड़ने के बाद गर्दन को धड़ से अलग कर दिया। इसके बाद आवाम के अंदर से अंग्रेजों का खौफ खत्म करने के लिए कटे सिर को लेकर बांदा की गलियों में घूमे।
काकरेल की हत्या के दो दिन बाद राजापुर, मऊ, बांदा, दरसेंड़ा, तरौहां, बदौसा, बबेरू, पैलानी, सिमौनी, सिहुंडा के बुंदेलों ने युद्ध परिषद का गठन करते हुए बुंदेलखंड को आजाद घोषित कर दिया। बांदा छावनी के अफसर और सिपहसलार-फरमाबरदार बांदा नवाब की पनाह में थे, लिहाजा अंग्रेजों ने मान लिया कि पैर उखड़ चुके हैं। गजेटियर के मुताबिक अंग्रेजों ने एक बारगी जोर लगाया था, लेकिन बिठूर के पेशवा की अगुवाई में मो। सरदार खां, नाजिम, मीर इंशा अल्ला खान की नाकेबंदी के चलते अंग्रेजों की रणनीति धराशायी हो गयी। इस युद्ध में कर्वी के मराठा सरदार के भाई ने मंदाकिनी और यमुना नदी पर अंग्रेजों की सहायता के लिए आने वाली सेना को रोके रखा। इस आंदोलन को धार देने वालों में अगर शीला देवी की घाघरा पलटन का जिक्र नहीं होगा तो बात अधूरी रहेगी। अनपढ़ शीलादेवी ने इस जंग में अहम हिस्सेदारी के लिए महिलाओं को एकजुट किया और फिर पनघटों पर जाकर अन्य महिलाओं को अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा करना शुरू किया। खास बात यह थी कि घाघरा पलटन में शामिल ज्यादातर महिलाएं बुर्कानशी और अनपढ़ थी, लेकिन क्रांति की इबारत में उनकी हिस्सेदारी मर्दो से कम नहीं रही।
“बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी” के संयोजक संजय पाण्डेय कहते है कि जब इस क्रांति के बारे में स्वयं अंग्रेज अफसर लिख कर गए हैं तो भारतीय इतिहासकारों ने इन तथ्यों को इतिहास के पन्नों में स्थान क्यों नहीं दिया?सच पूछा जाये तो यह एक वास्तविक जनांदोलन था क्योकि इसमें कोई नेता नहीं था बल्कि आन्दोलनकारी आम जनता ही थी इसलिए इतिहास में स्थान न पाना बुंदेलों के संघर्ष को नजर अंदाज करने के बराबर है.कहा कि बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी प्रचार प्रसार के माध्यम से बुंदेलों की यह वीरता पूर्ण कहानी सारी दुनिया तक पहुचायेगी
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January 21, 2009 at 2:48 pm (bundelkhand, mayawati, sanjay pandey, sonia gandhi, बुंदेलखंड)
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बुन्देलखंड राज्य निर्माण के प्रति दोहरा नजरिया रखने वाले दलों को महंगा साबित होगा।जहां बसपा प्रमुख पृथक बुंदेलखंड राज्य की वकालत करती है वही वे इस आशय का प्रस्ताव केंद्र को भेजने से कतराती है . इसका मतलब उनकी सोच में कोई खोट है. इसी तरह कांग्रेस भी बुन्देलखंड की बात करती हैं पर दूसरा राज्य पुनर्गठन आयोग बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती.
वर्षो से हो रही कवायद के फलस्वरूप राज्य निर्माण का कार्य सिफर बना हुआ है। कभी केन्द्र सरकार प्रात निर्माण की गेंद राज्य सरकार के पाले में डाल देती है तो कभी राज्य सरकार इसे किक कर पुन: केन्द्र सरकार के पाले में पहुंचा देती है। ये राजनैतिक दल बुंदेलखण्ड में फैले भ्रष्टाचार, अकाल की स्थिति पर आसू तो बहाते है, लेकिन इन समस्याओं को जड़ से मिटाने के लिए प्रात का निर्माण करने में पीछे हट जाते है। यही बड़ी वजह है कि बुन्देलखण्ड बड़ी कीमत चुकाने के पश्चात भी प्रात के रूप में पहचान हासिल नहीं कर पा रहा है।बुन्देलखण्ड का मसौदा वर्ष 1955 में ही तय कर लिया गया था, लेकिन तत्समय इसको अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका, जिसका खामियाजा आज तक बुन्देलखंडियों को भुगतना पड़ रहा है। कई संगठन प्रात निर्माण के मुद्दे को जीवित बनाये हुए है। प्रात निर्माण के लिए बुन्देलखण्ड एकीकृत पार्टी ने उग्र आदोलनों की शुरुआत की है ,इन आदोलनों के पश्चात तेजी से सरकारों का ध्यान बुन्देलखण्ड की बदहाली पर गया . वर्तमान समय में बुन्देलखण्ड में अनेक कार्यक्रम प्रात निर्माण की लड़ाई के लिए चलाये जा रहे है। रैलियों, आदोलनों के फलस्वरूप भी प्रात अब भी देश के नक्शे पर उभर नहीं पाया है। बुन्देलखण्ड में इतना राजस्व प्राप्त होता है जो एक प्रात के लिए जरूरी है। इसके बावजूद भी सरकारे इसे प्रात का नाम देने में सकुचा रही है। बुद्धिजीवी लोगों का मानना है कि सरकारों द्वारा बुन्देलखण्ड को प्रात नहीं बनाने के पीछे बड़े राजनैतिक दल ही है . सपा जैसे भी कई दल है जो अलग प्रात बनाने पर सीधे तौर पर न कर चुके है। उन्हे लग रहा है यदि बुन्देलखण्ड राज्य बन गया तो उनका बड़ा वोट बैंक खिसक जायेगा। बुद्धिजीवी मानते है कि भले ही बुन्देलखण्ड में अशिक्षितों की बड़ी तादाद हो लेकिन समय आने पर इस क्षेत्र के लोग ऐसे राजनैतिक दलों को सबक सिखा देंगे।आगामी लोकसभा चुनाव में यहाँ की जनता इनसे खुलकर बदला लेने के मूड में है
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January 18, 2009 at 4:43 pm (bundelkhand, sanjay pandey, बुंदेलखंड)
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बुन्देलखंड एकीकृत पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक संजय पाण्डेय ने कहा कि पार्टी का लक्ष्य है कि लोक सभा चुनाव से पूर्व पूरे बुंदेलखंड मे सदस्य संख्या कम से कम एक लाख हो जाये. हालाँकि देखने मे यह अत्यंत कठिन काम प्रतीत होता है परन्तु पार्टी संगठन के पदाधिकारी इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए दिन रात लगे हुए हैं, बांदा मे सुरेन्द्र तिवारी, झाँसी मे कुवर बहादुर आदिम, छतरपुर मे राजा प्रजापति, चित्रकूट मे लवलीन द्विवेदी ने इस अभियान कि शुरुआत कर दी है.
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